असमंजस
एक छोटी सी कहानी जो की एक कुम्भार के साथ बीती वो बात, जिसे आप के सामने कहानी के माध्यम से आप के सामने लाने का प्रयाश किया हु
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| photo by Regiane Tosatti |
बात एक छोटे से गावं की है, जहा के लोग बड़े ही खुशहाल जीवन जिया करते थे। इस गावं में लगभग सभी बिरादरिया रहती थी, उन लगभग सभी के पास थोड़ी बहुत जमीन थी।
उसी पे वहा के लोग खेती किसानी करते और अपने जाती बिरादरी के हिसाब से रोजगार भी करते। इसीलिए इनको पैसो की समस्या कभी नहीं होती। अगर किसी को कोई समस्या होती तो पूरा गावं इकठ्ठा हो के उसका हल निकाल लेता या सहायता करते।
ये कहानी वहा के एक कुम्भार की है, जिसका नाम नीरू था। वह मिटटी के बर्तन बना के पास से बाजार में बेचा करता।
एक दिन उसके दुकान पे एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति आया और पूछा क्या तुम्हारे पास पुरवा मिल जायेगा तो नीरू ने कहा नही मेरे पास पुरवा नहीं है, मै मिटटी के बर्तन बनता हु।
तो उस व्यक्ति ने कहा की मुझे 6000 पुरवा चाहिये था। तो कुम्हार ने कहा की मै आप को पुरवा बना के दे सकता हु मगर मुझे 7 से 8 दिन का समय चाहिए, आपके पास समय हो तो बताइए।
तब उस व्यक्ति ने कहा तुम्हारे पुरवा का क्या दाम देना होगा।
कुम्हार ने कहा "सवा दो रूपया हजार " तो उस व्यक्ति ने एक रुपये पेशगी दे दिया और बोला की ठीक है मै 8 दिन के बाद तुम्हारे पास आऊंगा।
इतना कह के वहा से चला गया।
उस दिन नीरू के बर्तन तो बीके नहीं इसी लिए वह शाम होने से पहले ही घर वापस लौट गया। की शाम होते होते वह पुरवा के लिए नदी के पास से मिटटी ले आएगा।
नीरू घर पहुचा अपने बर्तन नीचे रखा और तुरंत ही नदी की ओर जाने के लिए अपनी बेटी से बोला की जरा डलिया और फरसा लेती आओ नदी के पास से मिटटी लाना है।
तो बेटी दौड़ते हुए झोपड़ी की ओर गई थोड़ी देर बाद उसकी बेटी एक छोटा से फावड़ा जिसे अपने कन्धे पे रक्खी थी और डलिया घसीटते हुए ले के बहार निकली।
अपने पिता से सामने डलिया - फरसा रख के बोली मै भी आप के साथ चलुगी, नीरू बोला नहीं अपने माँ के साथ कल सुबह चली जाना इतना कह कर नीरू वहा से नदी की ओर चला गया।
शाम हुआ नीरू लडखडाते हुए घर के पास आया तो उसकी पत्नी बोली, “क्या हुआ नदी के पास कोई मिल गया था क्या चढा लिए हो”।
इसी तरह 8 दिन बीत गए, बड़ी मेहनत से सभी पुरवा बन कर तैयार हो गया। पुरवा भी सुन्दर एक बराबर था।
जब बाजार पंहुचा तो बाजार में बहुत कम लोग आये थे क्योकि यह वक्त से पहले ही बाजार में पहुच चूका था। थोड़ी देर बाद इसके बगल के दुकानदार वहा पंहुचा।
नीरू जब घर पंहुचा तो उसकी पत्नी पूछी “पुरवा लेने ग्राहक नहीं आया क्या” नीरू बोला “आज का सारा दिन बेकार हो गया, बर्तन लेने के लिए कुछ लोग आये भी थे मगर वापस चले गए हो सकता है की कल वो फिर आये।
नीरू बोला नहीं भाग्यवान मेरी चप्पल टूट गई है, इतना कहने के बाद मिटटी उतार के अपने झोपड़े के पास रख दिया और उसपर पानी का छिडकाव किया की सुबह तक मिटटी तैयार करने लायक हो जाएगी।
नवे दिन अपने रोजमर्रा के काम को जल्दी जल्दी निबटा के बाजार जाने की तैयारी में जुट गया और उसी के साथ का सभी पुरवा को अपने डलिया में रखा, मगर आज वो बर्तन बाजार में बेचने के लिए नहीं ले जा सकता क्योकि उसके डलिया में जगह ही नहीं बचा था।
डलिया में ऊपर तक पुरवा भर गया था, इसने सोचा की कोई बात नहीं आज पुरवा दे दुगा इससे अच्छी कमाई हो जाएगी इतना सोचते सोचते वह बाजार की ओर चला गया।
जो की पत्तल बेचता था “पत्ते को आपस में जोड़ के प्लेट बनाये जाते है उसे पत्तल कहते है” वह बोला “नीरू भाई आज पहले ही दुकान लगा लिए” नीरू ने जबाब दिया “हा भाई आज पुरवा लेने के लिए ग्राहक आने वाला है बस उए पुरवा दे दुगा और घर चला जाऊंगा।
इसके दुकान पे कुछ लोग आये बर्तन लेने के लिए मगर वापस चले गए इसी तरह कई घंटे बीत गए घर जाने का समय हो गया सभी अपना अपना सामान समेटने लगे नीरू के पास कुछ था नहीं वो अपना पुरवा अपने सर पे रखा और घर के लिए निकल पड़ा।
मै क्या करू” नीरू को कुछ समझ नहीं आ रहा था की वो बर्तन और पुरवा कैसे ले जायेगा, उसकी पत्नी बोली कल तुम बर्तन लेके जाओ कम से कम घर का खर्च तो चलेगा। नीरू बोला नहीं आज कोई काम आ गया होगा इसलिए वो आ नहीं पाया।
कल वो जरुर आजायेगा तो मै क्या करुगा।
ये सब तो लगा रहता है, दुसरे दिन भी वो बाजार जल्दी पंहुचा और शाम को पुरवा ले के वापस घर आगया। इसी तरह चार पाच दिन बीत गए ग्राहक नहीं आया।
बेचारा रोज बाजार जाता उसका इन्तेजार करता और घर वापस आ जाता। छठवे दिन पास के गावं के के अधेड़ उम्र के एक व्यक्ति पत्तल के दुकान पे पहुचे, बोले की मेरे पोते का विवाह है मुझे सात सौ पतरी चाहिए।
एक दो दिन में घर पंहुचा दो मै कुछ पैसे दे देता हु, पास ही पुरवा देख कर नीरू के पास आ के बोले पुरवा कैसे दिए भाई मुझे आठ सौ पुरवा चाहिए कितना पैसा देना होगा नीरू बोला बाबा सवा दो रूपया हजार है।
नही जो समझ में आये वो देदीजिएगा। व्यक्ति ने कहा समझाना क्या है मेरे पोते की विवाह है, पैसे कम थोड़े ही न करुगा चलो पुरवा गिनदो मै ले के जाऊगा। तो नीरू ने कहा की बाबा ये दुसरे का पुरवा है, आज नहीं मै आपको कल पुरवा दे दुगा।
इतना सुन कर बाबा बोले की ठीक है ये लो पैसे पुरवा गिन के पत्तल वाले को दे देना वो घर पंहुचा देगा इतना कह से वो चले गए।
आज भी शाम हो गया, लेकिन पुरवा लेने वो ग्राहक नहीं आया तो नीरू भी बडबडाते हुए घर की ओर चल पड़ा।
गावं में इसके घर से कुछ दुरी पे काम चल रहा था। नीरू ध्यान नहीं दिया इसका पैर मुड गया और गिर पड़ा उसके सारे बर्तन टूट गए।
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