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रेल यात्रा Essay

हमारे जीवन मे यात्राओं का बहुत महत्व है। हम सभी को किन्ही कारणों से कभी न कभी घर से दूर यात्रा करने जाना ही पड़ता है

 जैसे - कही भ्रमण करना हो, कभी संबंधियों से मिलना हो, कभी पढ़ाई के लिए जान हुआ, कभी इलाज के लिए गए, तो कभी नौकरी के सिलसिले में, कभी दर्शनीय स्थानों पर दर्शन - पूजन  हेतु जाना ही पड़ता है।

train passing by nature
(Photo credit: SenuScape from Pexels) 

यात्रा करने के अनेक साधन है, जिसमे से रेल यात्रा सबसे सुरक्षित आरामदायक सस्ता तथा सुलभ साधन है। आज तक मैंने अनेक बार रेल यात्रा की जिसमे में एक बार की यात्रा के बारे बताता हूं जो आज भी मुझे याद है। 

मेरी पहली रेल यात्रा, मुझे बनारस से दिल्ली अपने मौसी के यहाँ जाना था। चाचा जी ने मुझे बताया कि बनारस से दिल्ली जो रेल जाती है उसका समय शाम 7 बज कर 30 मिनट पर है, जो एकदम सही समय पर स्टेशन को छोड़ देती है।

मेने इससे पहले स्टेशन को दूर से देखा था और रेल गाड़ी को दूर से तो कई बार जाते देखा था। मुझे रात में रेल देखना बहुत अच्छा लगता था 

क्योंकि रात में उनमे सिर्फ उनके शीशे की रोशनी ही केवल आगे की ओर जाते दिखाई देती, तो ये मुझे बहुत अच्छा लगता कभी मुझे रेल पे बैठने का अवसर नही मिला था।

 मै भी हल्का सा नास्ता कर के पिता जी, भाई, और हमारी माता जी हम सभी रेलवे स्टेशन पहुँचे मुझे ऐसा लगा की यहाँ कोई मेला लगा हो, हम सभी मेला घूमने आए हो। 

रेलवे स्टेशन पे चारो ओर भीड़-भाड़ ही दिखाई दे रही थी। पिता जी ने हम सबको वेटिंगरूम में छोड़ कर टिकट लेने चले गए।

तभी लाउडस्पीकर पर गाड़ी आने की सूचना प्रसारित होने लगी। गाड़ी अपने सही वक्त पे स्टेशन पर आने वाली है। पिताजी टिकट लेके आये और बोले प्लेटफॉर्म पे चलो गाड़ी आने वाली है।

गाड़ी 7:20 पे प्लेटफॉर्म पे आगई। प्लेटफार्म से गाड़ी के अंदर हम बड़े कठिनाई से पहुचे क्योकि प्लेटफॉर्म से कुछ लोग गाड़ी पे चढ़ रहे थे तो कुछ लोग उतर भी रहे थे। हमे बड़े कठिनाई के बादगाड़ी  बैठने को सीट मिली।

गाड़ी चली तो प्लेटफार्म का शोर गूले तो समाप्त हो गया पर डिब्बे का शोर गुल बढ़ गया। चाय, नमकीन, तथा चना बेचने वाले लगातार आवाज लगा रहे थे और अपना सामान बेच रहे थे। 

गर्मी के मौसम के कारण पंखे की हवा भी गर्म हमको गर्म लग रही थीं। तकरीबन तीन स्टेशन एक बाद दो यात्रियों के उतारने के कारण हमको खिड़की वाली सीट मिल गई। 

गाड़ी चली तो उस समय मुझे कभी भी न भुलाने वाला अनुभव प्राप्त हुआ मानो खिड़की के बाहर साभी चीजे पीछे की ओर भाग रही हो। खट खट की एक ध्वनि जो मधुर संगीत की तरह कानो में गूंज रही थी। 

मैने पिता जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि देखो जब गाड़ी आगे की तरफ जाती है, तो चीजे अपनी जगह ही रहती है वह अपनी जगह नही बदलती बस हमे पीछे जाते हुए नज़र आती है

गाड़ी अपनी पटरी बदलती है तो खट खट की ध्वनि सुनाई देती है।

एक महिला ने डिब्बे में प्रवेश किया और बैठने के लिए लोगो से निवेदन करने लगी। कुछ लोगों ने मना कर दिया तभी एक व्यक्ति अपने सीट पे खड़े हो के उस महिला को अपनी सीट दे दी।

इन सभी चीजों को देख ही रह था कि डिब्बे में एक व्यक्ति गाना गाते हुए प्रवेश किया मै उसे देखने लगा कुछ लोगो ने पैसे दिए कुछ लोग उसे बिना कुछ दिए उसको आगे की ओर इशारा कर रहे थे। तो कुछ लोग उसका मजाक भी बना रहे थे। 

दिल्ली तक पहुचने से पहले ये मेरा पहला रेल यात्रा का अनुभव हुआ था, जो अपन पूरे जिंदगी में कभी भी भूल नही पाऊँगा। मन मे कइयों तरह के बातो का उथल पुथल चल रहा था। मैं पिताजी माताजी और भाई हम सब दिल्ली मौशी के यहाँ पहुँच गये।

tenali raman - SECRETS To BENEFITS OF STORY TELLING IN HINDI

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