वो 200 रुपये (कहानी)
यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की जी निहायती सरीफ, खुदगर्ज किस्म का आदमी है। उसके जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना को कहानी के रूप में आप के साथ सांझा कर रहा हूँ।
![]() |
| (Image credit: leo rivas on unsplash) |
कहते है इंसान जो फसल काट रहा है उसके बीज तो कभी उसी ने बोया होगा।
ये कहानी उस समय की है जिस समय लाट्री चला करती थी बहुत से लोग इस लाट्री सिस्टम से बरबाद हुए और बहुत से लोग आबाद हुए।
लाट्री का भी अपना एक नाश हुआ करता था। लोग सुबह सुबह एक मोटी सी डिक्सनरी लेके बैठ जाते और उसमें घंटो-घंटो जाने कौन सा गणित लगते रहते।
समय होने पर लाट्री का टिकट खरीद लाते शाम होने पर फिर लाट्री काउंटर पे जाते।
अपने लाट्री का टिकट मिलान करते कि उनका टिकट खुला की नही अधिकतर लोगों का वही हाल होता मुँह लटका हुआ बेचारे ।
हम लोग घर के बाहर खेलते - खेलते उनसे उनकी रद्दी टिकट मांगते, तो वह अपनी सारी टिकट निकल कर हम लोगो की तरफ उछाल देता हमसभी दोस्तो में छीनाझपटी शुरू हो जाती।
कभी लॉटरी खुल जाता तो कहते गणित सेट हो गया।
इसी तरह हमारे मुहल्ले में एक अंकल जी रहते थे। कहने को तो सरकारी नोकरी सुदा थे।
उनके यहाँ तीन तारीख से सात तारीख तक उधारियो का तांता लगता था। वो किसे से ज्यादा पैसे नही लेते बस सौ से पांच सौ तक ही लेते थे।
उसका लाट्री की टिकट ले के खेलते और हारते-जीतते ऐसे ही चलता रहता।
बात एक दिन की है, हमारे पड़ोस में एक दादी रहती थी। लोगो का कहना था कि दादी बहुत पैसा रखी है।
वो अंकल जी दादी के पास गए और बोले दादी हमे आठ सौ रुपया दे दो में शाम को दो सौ रुपये ज्यादा दूँगा मेरा गणित एकदम सेट हो गया है, लाट्री पक्का निकलेगा।
दादी भी लालच में आगई अपने घर मे गई और आठ सौ रुपये लाके देदिया। अंकल जी पैसे लिए और चले गए।
दादी दोपह से ही उसके घर के पास जाती और घूम के चली आती इसी तरह शाम हो गई,
दादी अपना खाना भी नही बनाई बस उसके घर के पास जाती और वापस चली आती तकरीबन रात नो बजे अंकल जी अपने हाथों में मिठाई का डिब्बा लिए सबसे पहले दादी के घर गए और दादी से बताया की उसको पचास हजार की लाट्री लगी।
लो दादी ये आठ सौ रुपये तुम्हारे और ये दो सौ रुपये अलग से तुम्हारे लिए मिठाई भी लाया हूं खाँ लो।
मिठाई देने के बाद चाचा जी अपने घर चले गए। चूंकि दादी तो खाना बनाई थी नही इसीलिए भूख तो लगी थी।
जम कर मिठाई खा ली और सो गई जब भोर हुआ तो उनका पेट फूल चुका था वो बेचैन हो रही थीं,
पेट मे खूब तेज दर्द भी हो रहा था मुँह से कराह निकल रही थी बेचारी।
दादी के घर वालों ने बहुत से देसी नुस्खों का उपयोग किया मगर कोई आराम नही हुआ। इसी तरह कई घंटों बीत गए दादी को लोग बगल के छोटे से अस्पताल में ले गए।
डॉक्टर ने उनको दबा पिलाई जिससे उनको उल्टी होने लगी और पेट पूरा साफ हो गया और दादी को तुरंत आराम मिल गया।
अब दादी ने कहा डॉक्टर साहब पैसे कितने हुए डॉक्टर ने बोला दादी आप से पैसे नही लूंगा बस दबा के दो सौ रुपए दे दीजियेगा।
जब दादी ने ये बात सुनी तो जोर जोर से हँसने लगी और बोली वो दो सौ रुपये।
इस कहानी में बात छोटी सी है, मगर इसमें जो बात बताया है।
वो बहुत बड़ी बात जो जैसा करता है वो वैसा भरता है । इसी लिए कभी भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिसमे लालच हो ।
hindi kahani - Story in Hindi with short and good moral in 500 words


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें