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अलमारी की कहानी

यह कहानी एक अलमारी के बारे में है। इसे दूर रखने के लिए लोगों ने क्या किया?वह उस अलमारी को हटाने में कैसे सफल हुये? क्या वह उस अलमारी को हटा पाएंगे?

purani almari kahi rakhhi hai
Photo by Esperanza Doronila on Unsplash

कहानी की शुरुआत रमानी टोला नामक गांव से होती है। गाँव में एक लोहार रहता था। उसका नाम विवेक था, लेकिन उसके आसपास के लोग उसे बेग-उस्ताद के नाम से जानते और बुलाते थे।


उसका सबसे पुराना दोस्त मल्लू दोनों काम की तलाश में अपने गांव से बाहर जाते हैं और एक चाय की दुकान के पास खड़े होते हैं।

आस-पास के लोग जानते हैं नीलू की चाय की दुकान के पास मिल जाएंगे मजदूर।

क्योंकि आसपास के लोग भी वहां जाया करते थे, जिन्हें काम या काम करना होता था, वे सभी वहीं जाते थे। इससे उन दोनों लोगों का काम आसानी से हो जाता।

एक दिन जब दोनों दोस्त गांव के बाहर इंतजार कर रहे थे, एक सेठ जी उनके पास आए और कहा कि मेरे घर में एक अलमारी है जिसे दूसरे कमरे में रखना है, क्या तुम लोग यह काम कर सकते हो? ,

लेकिन मुझे पाँच आदमियों की ज़रूरत पड़ेगी, वह अलमारी बहुत भारी और बड़ी है। अगर कोई और मिल सकता है, तो चलो मेरे लिए करते हैं।


विविक कहता है, सेठ जी आज तो आदमी मिलाना मुस्किल है, कल मिल जायेगे क्यकि सभी अपने – अपने काम पे चले गए होगे। सेठ जी बोले चलो मेरा माकन देख लो, कल तुम मेरे माकन पे आदमियों के साथ चले आना और मेरा काम कर देना।

विविक और उसका दोस्त मल्लू सेठ जी के साथ उनके गावं की ओर चल देते है। नदी के दुसरे किनारे पे सेठ जी की हवेली थे जो थोड़ी सी पुरानी हो गई थे, मानो कई सालो से सफाई का काम नहीं हुआ हो।

मल्लू हवेली देख कर डर जाता है की ये तो पुरानी हवेली है यहाँ भूत तो होगा ही मै इसमें काम नहीं करुगा मुझे डर लगता है, तो विवेक कहता है, मजाक मत करो चलो कुछ नहीं होगा आज आलमारी देख के आते है हमे रहना थोडेही है। अपना काम कर के अपने घर चले जायेगे।

किसी तरह मल्लू हवेली के अन्दर गया और उस आलमारी को देता तो वो काफी बड़ी आलमारी थी, जिसके लिए सेठ जी ने इन दोनों को बुलाया था।

तब सेठ जो ने कहा आज जा के लोगो से बता कर लेना आलमारी देख लिए हो न, विविक बोलता है हम लोग जा रहे है कल आते है, तो सेठ जी ने कहा आज क्या करोगे आज का दिन तो तुम्हारा ख़राब हो गया न तो विविक ने कहा कोई बात नहीं सेठ जी ये तो हमारा रोज का काम है।

तो सेठ जी ने कहा देख वह कुछ गमले है उसे उठा के बरामदे में सजा दो। विवेक और मल्लू एक - एक कर के सरे गमले बरामदे में ले जाने लगे सभी ने अपना काम कर लिया और जाने लगे।

तो सेठ जी ने कहा क्या हुआ विवेक काम हो गया। विवेक बोला हा सेठ जी हमने सारा गमला बरामदे में रख दिया है, हम गावं जा रहे है। सेठ जी बोले अरे भाई अपनी दिहाड़ी तो ले जाओ काम के पैसे नहीं लेते हो क्या?

तब सेठ जी ने अपने मुन्सी से कहा इन दोनों लड़को को पैसे दे दो, और कुछ खिला के जाने दो। मुन्सी ने इन दोनों को पैसे दिए और बोला क्या कहोगे बताओ जो खाना है मै बनवा देता हूँ। विवेक कहता है कोई बात नहीं शाम होने वाली है मुझे गावं में जा के सबसे बात भी करनी है।

मुन्सी जी ने कहा “कुछ नहीं विवेक हमारे ये हवेली का रिवाज है की कोई भी यहाँ आता है तो बिना खाए-पिए यहाँ से नहीं जाता, अगर तुम जिद करोगे तो सेठ जी सुन लेगे, तो तुम अपना सोचना मै नहीं जनता मुझसे मत कहना की मैंने बताया नहीं”।

शाम को खाना पीना कहा के विवेक और मन्नू अपने गावं आ गये दोनों अपने आस पास के लोगो से मिलाने गए। विवेक तो आलमारी की बाते कर रहा था।

मगर मल्लू वह के खाने की बाते बताने लगा की उन लोगे ने जा खाना उस हवेली में खा लिया वैसा अपने पुरे जिंदगी में नहीं खाया होगा। इन दोनों की बातो को सुनाने के लिए और भी लोग आ गए।

अब दूसरे दिन विवेक और मल्लू इनके अलावा पांच आदमी और आ गए, अब यहाँ दो आदमी ज्यादा हो गए अब बारी दो लोगो के कम करने की, विवेक बोला मुझे लगता है वो आलमारी हम सभी से नहीं उठेगी।

अपने साथ रस्सी, लकड़ी की बल्ली आदि जो भी उन्हें लगा की आलमारी को हटाने में काम आयेगी उसे ले लिया। अब सभी हवेलो के लिए निकल पड़े।

थोड़ी देर में सभी हवेली पहुचे इनके साथ जो लोग भी गये थे वो चारो तरफ की बागवानी देख कर हैरान थे, उसमे तरह - तरह फुल खिले हुए थे, चिडियों के चहकने की आवाजे गूंज रही थी बहुत सुहाना लग रहा था।

उनके साथ विवेक और मल्लू भी हैरान थे, क्यों की जब वो कल उस हवेली में आये थे तो, उस हवेली का बगीचा एकदम उजाड़ – बियाबान लग रहा था।

इनकी हैरानी तब और बड गई जब इन्होने देखा की उनके द्वारा रख्हे गमलो में फुल खिल रहे, क्योकि कल गमला बिलकुल खाली था।

सामने से मुन्सी जी ने आवाज लगाया अरे भाई काम – वाम करना है की नहीं बस बागवानी के फूल ही देखते रहोगे क्या?

कल रात भर 50 मजदुर लगे थे इस बागवानी में नये फुल लगाने के लिए, वो पूरी रात काम किये तब जा के बागवानी बनी है।

देखो फूलो के खिलते ही भवरे भी मडराने लगे, यहा चिड़िया खोजने पे नहीं दिखाई देती, लेकिन अब पूरी बारात लगी है। हवेली का तो पूरा माहोल ही बदल गया।

कल सेठ जी की बेटी विदेश से बहुत दिनों बाद गावं आ रही है ये सब साफ़ – सफाई इसी लिए चल रही है।

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